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Thursday, January 1, 2015

मानसिक तकलीफों में दवाई कैसे काम करती है ।

मानसिक दवाइयाँ कैसे काम करती है ?


“ विचारों की तकलीफ पर दवाई कैसे असर करती है ? “ यह सर्वसाधारणत: मनमें उठने वाला प्रश्न है की “ तकलीफ तो मन की है ; विचारों की है | उसमें दवाई का क्या काम हो सकता है | दवाई तो एक रसायन मात्र है | “ कई संशोधनों के बाद मानसिक विज्ञान शास्त्रज्ञो को पता चला की मन के अंदर विविध प्रकार के रसायन अर्थात न्यूरो ट्रान्समीटरर्स (Neuro- Transmitters) होते है जो विविध विचार, भाव भावनाओं, बरताव ईनके ऊपर कार्य करते है | मस्तिक में अनेक विविध भागों में अनेक खास कार्य निर्धारित किये हुए होते है | मस्तिक में चलने – बोलने का अलग अलग केंद्र होता है वैसे ही विचारों और भाव – भावनाओं के भी अनेक विशेष केंद्र होते है | जब कभी किसी इंसान के जीवन में तनाव बढ़ जाता है ; तब मस्तिक में तनाव के रसायन (Stress-Harmones) निर्माण होते है | जब ये तनाव – रसायन ज्यादा दिनों तक मस्तिक के बढे रहते है तब वे मस्तिक के भाव (Emotion) वाले केंद्र पर कार्य करने लगते है | ईनके कार्य की वजह से ; मस्तिक के उदासीनता (Depression) पैदा करने वाले केंद्र सक्रिय (Activate) होने के वजह से इंसान उदास रहने लगता है | कुछ काम में ; खाने पीने में मन नहीं लगता | लोगों से बातचीत करना कम कर देता है | कभी कभी बीना किसी वजह भी ये तनाव के रसायन तयार होते है ( मस्तिक के अनैसर्गिक (Abnormal) कार्य करने के वजह से |) तो बाहरी वजह न होते हुए भी मस्तिक के मानसिक तकलीफ वाले केंद्र सक्रीय हो जाते है और इंसान का बर्ताव बदल जाता है | ईन तकलीफों के लिए जो औषधियाँ संशोधित हुई है उनमें मस्तिक के मानसिक तकलीफ तयार करने वाले केंद्र पर कार्य करने की क्षमता होती है | ये दवाईयाँ मन के तनाव और उदासिनता देने वाले रसायनों को कम करती है और उत्साह और आनंद देने वाले रसायनों को बढ़ाती है | इसलिए दवाईयाँ मानसिक बिमारियों के काम आती है | मानसिक बीमारी किसी भी आम बीमारी की तरह ही होती है | मधुमेह में स्वादुपिंड (Pancreas) ग्रंथी बराबर काम नहीं करती वैसे ही मानसिक बिमारियों में मस्तिक की कुछ पेशियाँ काम नहीं करती | ईसलिए बिना हिचकिचाहट तकलीफों के उपचार / दवाओं अपने मानसोपचार तज्ञ के मार्गदर्शन में जरुर ले | --डॉ निशिकांत विभुते

Tuesday, December 23, 2014

क्या मानसिक दवाईयाँ मेरी किडनी खराब करेगी ?

Side effects of psychological medicines


मानसिक तकलिफो के उपचार के बारे में गलत फहमियाँ
(MYTH ABOUT PSYCHIATRIC MEDICATIONS)
“ * मनोसोपचार तज्ञ सिर्फ नींद की गोलियां ही देते है “
सालोंसे यह एक सर्वसामान्य तौर पर लोगों में गलतफहमि बैठ गई है की “ मनोसोपचारतज्ञ (PSYCHIATRIST) सिर्फ नींद की गोली ही देते है | उनसे इंसान पूरा वक्त सोते रहता है | सोते रहने से वह इंसान किसी काम का नहीं रह जाता |”
ईस विचार धारणा निर्माण होने के पीछे कुछ कारण जरुर है | सालों पेहले वैद्यकिय विज्ञान  (medical science) में शोध हुए ; तब विविध मानसिक तकलीफों के लिए जो दवाईयाँ शोध कर के (Research) उपलब्ध की गयी उनमें बिमारियों को ठीक करने के साथ साथ नींद का आड असर / साईड इफ़ेक्ट भी होता था |
ईस वजह से मरीज दवा चालू करने के बाद नींद में रहता था |
लेकिन वो दस – पंधरहा साल पहले की बात है |
आजकल जो नई दवाईयाँ विज्ञानने संशोधन करके निर्माण की है उनमें ईस तरह के साईड इफेक्ट्स नहीं रहतें |
नई दवाईयाँ चालू करने के बाद मरीज की मानसिक तकलीफे धीरे धीरे कम होती जाती है और वह व्यक्ती किसी और आम ईंसान की तरह रोज का काम कर सकता है | चाहें वो घर का काम हो या बाहर का या बोद्धिक काम हो |
ईस लिए “मरीज हमेशा सोते रहेगा” यह वेहम मन में रख कर मनोसोपचार तज्ञ के पास लेकर जाने को ना टाले |मरीज को जल्दी ठीक करना जरुरी होता है |
जो भी साईड इफेक्ट्स दवा से होते है उन्हें अपने डॉक्टर को  खुलकर बताएं | जिस की वजह से मरीज को आछा उपचार मिल सकेगा और आड असर /साइड इफ़ेक्ट भी नहीं होगा |