What is FOBO ( Fear Of Better Option)? फ़ो. बो. क्या होता है ? Explained in Hindi

 FOBO explained in Hindi

फ़ो. बो.
(Fear Of Better Option)
(अच्छे विकल्प को खोने का डर)

Fobo in Hindi


घटना : चंपक (काल्पनिक नाम) कई दिनों से सोच रहा था की नया मोबाईल  लेना जरुरी है | लेकिन अब पुराना मोबाईल पूरी तरह से बंद पड जाने की वजह से, अब मोबाईल लेना अत्यावश्यक हो चुका था |

वह रोज घंटो तक बैठ कर ईस विषय में सोचता रहता है | कोनसा मोबाईल अच्छे कंपनी का है | अगर एक मोबाईल की बैटरी अच्छी निकलती थी तो उसका कैमेरा साधारण निकलता था | चंपक समझ नहीं पा रहा था की उसे महँगा मोबाइल लेना चाहिए ताकी वह ऑफिस के बहोत सारे काम मोबाइल से ही कर ले या फिर मोबाइल सस्ता ले कर एक लैपटॉप ले लेना चाहिए | कभी कभी उसे लगता था की अब मोबाइल की जगह टेबलेट या आयपेड़ ले लेना चाहिए |

अब  वह और मुश्किल में पड़ा जब उसे पता चला की कुछ मोबाइल्स सिर्फ ऑनलाइन ही मिलते है | वह तय नहीं कर पा रहा था की ऑनलाइन ले या ऑफलाइन | विचार करते करते उसे अब चक्कर आ रहे थे | क्या आपके साथ भी कभी कभी ऐसी घटनाएं होती है? क्या आपको भी निर्णय लेना मुश्किल होने लगता है?

क्या आपको लगता है की जो निर्णय आप लेने जा रहे हो उससे बेहतरीन भी निर्णय लिया जा सकता है | लेकिन आप नहीं ले पा रहे हो ?

तब आप भी इस फ़ो. बो. (Fear of Better Option) के शिकार हो चुके हो |

Q. What is FOBO ?
प्र. ये फ़ो. बो. क्या है ?

उ. फ़ो. बो. मतलब फियर ऑफ़ बेटर ऑपशन्स  (FEAR OF BETTER OPTIONS) ; और बेहतर विकल्प का निर्णय अपने हात से छुट जाने का डर |

मतलब फोबो से ग्रथित व्यक्ति को ऐसे लगता है की उसके पास बहुत विकल्प है | उनमें से वह सिर्फ एक विकल्प या ऑप्शन चुन सकता है | उसने जो निर्णय लिया है उससे बेहतर जो विकल्प या ऑप्शन किसी और ने चुन लिया है | और वह और इन्सान अत्यंत आनंद में है | और वह विकल्प मै खो चूका हूँ , या खो जाऊंगा, ऐसा डर लगना | यह फोबो होता है |

Q. Who coined the term “F.O.B.O.”?
प्र. ‘फ़ो.बो.’ यह नाम इस मनोवृत्ति - या मन की दशा को किसने रखा ?

उ.  फ़ो.बो. नाम किसी मनोवैज्ञानिक या मनोविश्लेषक (Psychologist or Psychoanalyst) नें नहीं रखा यह जानकर आपको आश्चर्य होगा |

‘फ़ो.बो.’ यह नामकरण एक वेंचर कैपिटलिस्ट याने एक पूंजीवादी निवेशक (Venture Capitalist) 

पैट्रिक मैक-गिनीज ‘ (Patrick Mcginnis) ने रखा है | यह शब्द उन्होंनें पहली बार २००४ में हारवर्ड बिज़नेस स्कूल (HARVARD BUSINESS SCHOOL) के एक वर्त्तमान पत्र में इस्तेमाल किया था |

शायद निवेशकों को (INVESTORS) हमेशा एक अच्छे विकल्प की खोज रहती है | और इसलिए शायद उन्हें इस फोबो का सामना ज्यादा करना पडता होगा | इसलिए यह नाम निवेशकोंकी बीच से सामने आया है, ऐसा हो सकता है |

Q. How Common is FOBO ?
प्र. क्या फोबो होना बहुत ही कॉमन (Common),  सर्वसाधारण है ? जनता में कितने लोगों में फोबो सामने आता है ?

उ. लिंक्ड-इन (Linked-In) इस प्रख्यात वेबसाइट द्वारा किये गए एक संशोधन पोल (POLL) में यह बात सामने आई है की २/३; ‘तीन में से दो’ कर्मचारी (EMPLOYEES) इस फोबो से ग्रथित है | तीन लोगों को सवाल पुछा की ‘क्या आप सही जगह पर काम कर रहे हो ? क्या आपने काम करने का जो निर्णय लिया है, जहाँ काम करने का निर्णय लिया है, उससे आप संतुष्ट हो?’ तीन में से दो कर्मचारी बोले “संतुष्ट नहीं है “| इस संशोधन से हमें पता चल रहा है की फोबो एक बहुतही Common आमतौर पर’ ज्यादा लोगों में पायी जाने वाली मनोवृत्ति है |

Q. What are the symptoms of FOBO ?
प्र. कैसे पहचाने की कोई व्यक्ति फ़ो. बो. से ग्रथित है ? फ़ो.बो. के लक्षण क्या है ?

उ. ‘फोबो’ व्यक्ति के विविध कार्यों को बाधित करता है | उसके प्रगति में, उसकी मन की शान्ति में बाधा बनके खड़ा होता है | 

कुछ उदाहरण हम देख सकते है -

१) अपने काम, काम करने की जगह, प्रगती, इत्यादि को और किसी के काम से तुलना करना | और उदास रहना |

२) अपने हाथ में एक बेहतरीन विकल्प होते हुए भी ‘और विकल्प’ ढूंडते ही रहना | किसी भी विकल्प से संतुष्ट न होना | 

३) वक्त की कमी को नजरंदाज करते हुए किसी निर्णय पर न आना | निर्णय लेने की प्रकीया को आगे ढकेलते रहना

४) सामनेसे आने वाले रिश्ते या आने वाली OPPORTUNITY संधी को ठुकराना | आस लगाए बैठना की इससे बेहतर रिश्ता मुझे मिल सकता है | विचार करना की कोई ‘परफेक्ट पर्याय ‘ आगे आने वाला है |

५) “निर्णय लेने की घडी”, “वक्त के अंदर निर्णय लेने की जरुरत” ऐसे वक्त में अत्यंत घबराहट और बेचैनी निर्माण होना | निर्णय गलत हो सकता है, यह सोच कर डरना |

ये कुछ लक्षण हमें थोडी समझ देते है की यह फोबो कितना बडा प्रॉब्लेम है |

Q. How deeply FOBO can impact our life ?
प्र. फोबो हमारे जीवन को कितने गहराई से नुकसान पहुँचा सकता है ?

उ. फोबो इन्सानके वक्त का नाश करता है | व्यक्ती जितने पर्याय ज्यादा ढूंडता है वह उतना ही ज्यादा उलझन में पडता जाता है | वक्त के अंदर निर्णय न लेने से उसे काफी नुकसान हो सकता है |

निर्णय लेने के बाद कार्य करने के लिए भी वक्त की जरुरत होती है | उस कार्य के लिए वक्त कम पड़ने लगता है | और बेहतर रिश्ता मिलेगा इस चक्कर में वक्त हाथ से निकल जाने पर अच्छे रिश्ते आने कम या बंद हो जाते हुए कभी कभी हम देखते है |

प्र. व्यक्ती को फोबो क्यों होता है ?
(What are the causes of FOBO ? )

उ. फोबो मन की ऐसी स्थिती है जो घबराहट, चिंता और उदासिनता से भरी है जिसमें व्यक्ती को निर्णय लेने में मुश्किल होती है | ऐसी मनःस्थिती निर्माण होने के पीछे कई कारण हो सकते है |

१) SELF DOUBT खुद के उपर शंका :

व्यक्ती को अपने खुदके निर्णय लेने पर, सही निर्णय लेने पर शंका होती है | इसके पीछे कई कारण हो सकते है | जैसे बचपन में “हमेशा सही निर्णय ही लेना” ऐसी दि गई सीख ; या “मुझे कभीभी गलत नहीं होना चाहिए” ऐसे विचार हो सकते है |

२) COMPARISON तुलना करना :

अपने आप को औरों से तुलना करना सोशल मीडिया की वजह से आसान हो गया है | दूसरा व्यक्ती हमसे ज्यादा बेहतर निर्णय लेकर बेहतर जिंदगी जी रहा है ऐसा विचार तुलना करने वाले व्यक्ति के मन में घर करने लगता है |

३) FEAR OF CRITICISM आलोचना का डर :

अगर मैंने गलती कर ली तो लोग मेरे उपर हँसेगे ऐसा डर लगता है | आलोचना और टिप्पणी करेंगे जो मुझे बिलकूल सहन नहीं होगा | गलत निर्णय हँसी का कारण बन जायेगा | इसलिए निर्णय लेने से ही डर लगने लगता है |

४) LACK OF SKILL OF TIME MANAGEMENT AND DECISIVENESS वक्त के नियोजनता और निर्णायक होने की कुशलता का आभाव :

बचपन से हमने यह सिखा नहीं होता की वक्त के अंदर निर्णय लेना जरुरी है, या निर्णयिक होना जरुरी है | और यह कुशलता का आभाव फो बो के रूप में आगे चलके देखने मिलता है |

प्र. इस ‘फो बो’ को कैसे ठीक करें ?
HOW TO OVERCOME FOBO (Fear Of Better Option) ?

उ. १) वक्त को समझे : 

निर्णय लेना जितना जरुरी होता है उतना ही निर्णय उचित वक्त के अंदर लेना भी जरुरी होता है | इस बात को ध्यान में रखते हुए जो भी सभी अंगों से योग्य लगता है वह निर्णय ले लेना चाहिए |

२) निर्णायकता : यह अपना गुण बनाएं :- 

निर्णायक बनना एक कुशलता है | ‘निर्णायक’ बनने का संकल्प मन में ठान लो | जब ‘विकल्प’ सामने आते है तो विकल्प गलत भी हो सकता है लेकीन अनिर्णायक मनःस्थिती में रुके रहना ज्यादा गलत है | एक बार हम किसी भी नतिजे पे पहुंचे तो “निर्णायक” Decivise बनने के लिए निर्णय ले लें |

३) तुलना न करें : 

अपना ’निर्णय’ हमारे लिए अच्छा या कम अच्छा हो सकता है | दुसरे निर्णय का अपने निर्णय से कुछ लेना देना नहीं है | यह जानकर दूसरों से तुलना करना छोड़ दो |

४) अनुभव : (Experience) :

 अपने पुराने अनुभव को याद करें | अपने मित्र और परिजनों से राय लेने बाद निर्णय लें |

५) निर्णय की शक्यताओं को समझे (Breakdown your decision) :

 कोनसा निर्णय कितना ज्यादा या कम फायदेमंद हो सकता है इस बात के ऊपर अपने निर्णयों को विभाजीत करें | जैसे ज्यादा फायदे देने वाला, मध्यम फायदा देने वाला, कम फायदा देने वाला निर्णय, वैसे ही Risk याने जोखिम किस निर्णय में कम या ज्यादा है ऐसा वर्गीकरण कर सकते है |

६) आलोचना (CRITICISM) की चिंता छोड़ें :- 

अगर हमारे निर्णय पर कोई टिप्पणी करता है, या हँसता है, तो उससे नाराज न हो जाएं | घुस्सा न करें | उस व्यक्ती ने की हुई आलोचना कितने हद तक सहीं है इसकी जाँच करें | अगर जरुरत है तो निर्णय में बदलाव जरुर करें | अन्यथा बिना वजह की हुई आलोचना को नजरंदाज करना सिख लें |

हमारा निर्णय अच्छा निर्णय साबीत हो सकता है इस पर गौर करें |

७) निर्णय के परिणाम को मान्य करें (Accept the results) : 

अगर हमने कुछ सोचविचार करने बाद पूरा संशोधन अच्छेसे करें | औरों की राय और खुदका अनुभव इनका उपयोग करें | और ज्यादा से ज्यादा बेहतर निर्णय ले लें | 

     अब उसके जो परिणाम (Results) आएंगे उसके लिए तयार रहें | जो भी निर्णय आयेंगे उसमें से सिखकर हम आगे चल कर और बेहतर निर्णय ले सकते है | 

इस तरह हम हमारे सोचने के ढंग में बदलाव लाकर इस ‘फोबो’ को ठीक कर सकते है |

संक्षिप्त (Abstract) : ‘फोबो’ यह कोई बिमारी नहीं है | यह मन की अवस्था है जो हमारे निर्णय लेने की प्रक्रिया को बाधित करती है | अगर हम हमारे विचार करने के ढंग में बदल करें | हमारे तुलना करने की आदत को कम करे, और निर्णायक (Decisive) बनने की कोशिश करें तो यह ‘फोबो’ ठीक हो सकता है | 




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